(((( भगवान से सम्बन्ध ))))

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एक पंडित जी थे। पंडित जी ने एक दुकानदार के पास पाँच सौ रुपये रख दिये..
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उन्होंने सोचा कि जब बच्ची की शादी होगी, तो पैसा ले लेंगे, 
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थोड़े दिनों के बाद जब बच्ची सयानी हो गयी, तो पंडित जी उस दुकानदार के पास गये।


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दुकानदार ने नकार दिया कि आपने कब हमें पैसा दिया था।
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उसने पंडित जी से कहा कि क्या हमने कुछ लिखकर दिया है ? पंडित जी इस हरकत से परेशान हो गये और चिन्ता में डूब गये।
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थोड़े दिन के बाद उन्हें याद आया कि क्यों न राजा से इस बारे में शिकायत कर दें ! ताकि वे कुछ फैसला कर दें एवं मेरा पैसा कन्या के विवाह के लिए मिल जाये।
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वे राजा के पास पहुँचे तथा अपनी फरियाद सुनाई..
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राजा ने कहा.. कल हमारी सवारी निकलेगी तुम उस लालाजी की दुकान के पास खड़े रहना !!
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राजा की सवारी निकली.. सभी लोगों ने फूलमालाएँ पहनायीं, किसी ने आरती उतारी।
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पंडित जी लालाजी की दुकान के पास खड़े थे !
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राजा ने कहा… गुरुजी आप यहाँ कैसे ! आप तो हमारे गुरु हैं ? आइये इस बग्घी में बैठ जाइये,
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लालाजी यह सब देख रहे थे, उन्होंने आरती उतारी, सवारी आगे बढ़ गयी।
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थोड़ी दूर चलने के बाद राजा ने पंडित जी को उतार दिया और कहा कि पंडित जी हमने आपका काम कर दिया। अब आगे आपका भाग्य !!
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उधर लालाजी यह सब देखकर हैरान थे कि पंडित जी की तो राजा से अच्छी साँठ-गाँठ है..
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कहीं वे हमारा कबाड़ा न करा दें !!
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लालाजी ने अपने मुनीम को पंडित जी को ढूँढ़कर लाने को कहा..
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पंडित जी एक पेड़ के नीचे बैठकर कुछ विचार कर रहे थे, मुनीम जी आदर के साथ उन्हें अपने साथ ले गये।
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लालाजी ने प्रणाम किया और बोले.. पंडित जी हमने काफी श्रम किया तथा पुराने खाते को देखा..
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तो पाया कि हमारे खाते में आपका पाँच सौ रुपये जमा है।
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पंडित जी दस साल में ब्याज के बारह हजार रुपये हो गये, पंडित जी आपकी बेटी हमारी बेटी है..
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अत: एक हजार रुपये आप हमारी तरफ से ले जाइये तथा उसे लड़की की शादी में लगा देना,
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इस प्रकार लालाजी ने पंडित जी को तेरह हजार रुपये देकर प्रेम के साथ विदा किया..
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जब मात्र एक राजा के साथ सम्बंध होने भर से विपदा दूर जो जाती है तो…!
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हम सब भी अगर इस दुनिया के राजा, दीनदयालु भगवान् से अगर अपना सम्बन्ध जोड़ लें…!
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तो आपकी कोई समस्या, कठिनाई या फिर आपके साथ अन्याय का.. कोई प्रश्न ही नही उत्पन्न हो

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